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माँ बनने के साथ शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर जो परिवर्तन होते हैं और अनुभूतियों में जो उतार-चढ़ाव आते हैं उनके बारे में बहुत अंतरंगता से मैं से माँ तक में बात की गयी है। साथ ही कुटुम्ब को आगे बढ़ाने के लिए जो परिवार और समाज का दबाव और अपेक्षा का बोझ एक नयी-नवेली दुल्हन पर डाला जाता है, उसकी भी चर्चा है। माँ बनने पर औरत के पूरे व्यक्तित्व, सोच और जीवन-मूल्यों में परिवर्तन आ जाता है, एक तरह से उसका अस्तित्व ही बदल जाता है और माँ का रूप उसके अन्य सभी अस्तित्वों पर जैसे हावी हो जाता है। मैं से माँ तक अनुभव यात्रा केवल अंकिता जैन की ही नहीं, बल्कि वह उन सब महिलाओं और बहुत से दम्पतियों की है जो जीवन के इस सुन्दर मोड़ पर हैं। वे सब लेखिका की यात्रा में अपनी यात्रा की कहानी पायेंगे। अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान अंकिता जैन ने प्रभात खबर और लल्लनटॉप में 'माँ-इन-मेकिंग' स्तम्भ लिखना शुरू किया, जिसे पाठकों ने बहुत पसन्द किया और वहीं से इस पुस्तक की प्रेरणा मिली। तीन वर्षों तक वह बतौर सम्पादक और प्रकाशक के रूप में मासिक पत्रिका रू-ब-रू दुनिया का प्रकाशन कर चुकी हैं और अब तक अंकिता जैन का एक कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुका है। उनका संपर्क है [email protected] Review: Life experience - Bhut acchi book hai .Har pregnant lady ko padna chahiye . Bhut kuch sikhne ko milega bhut sare examples bhut sare myth dur hoge. Must read book in pregnancy time Review: समीक्षा - मै से माँ तक - समीक्षा --------------------------- मै से माँ तक महज एक किताब नही है , गर्भावस्था की मधुर और संवेदनशील जीवन यात्रा के हर पड़ाव का संस्मरण है , यह एक स्त्री दर्शन है , एक अनुभूति की अनंत यात्रा है जिसे 127 पृष्ठों में समेटा गया है ! मै से माँ तक हर गर्भवती स्त्री की अनुभूति है , जिसे लेखिका ने न केवल लिखा है वरन बखूबी जिया भी है ! मै से माँ तक हर एक महिला का मनोविज्ञान है जिसे बच्चे की चाह रखने वाली हर स्त्री और बच्चे की किलकारी सुनने की तमन्ना रखने वाले हर भावी पिता को न केवल पढ़ना चाहिए वरन हर द्रष्टान्त में दी गयी सलाह को अपनाना भी चाहिए ! एक स्त्री की गर्भगाथा को लेखिका ने बढे ही सहज ढंग से लिखा है ! किताब नई-नवेली दुल्हन , कामकाजी महिलाएं , बच्चे की आस में बैठी महिलाओं के लिए एक अर्थपूर्ण सलाह-पुस्तिका है ! लेखिका द्वारा हरसंभव देसी नुस्खे , प्रेगनेंसी (गर्भावस्था) से जुडी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी तकनिकी और चिकित्सकीय सलाह को साझा किया है और पूर्ण विवरण भी दिया है ! कहते है हम किसी के दर्द को सह कर महसूस तो नही कर सकते लेकिन उस दर्द के साथ अपनापन दिखाकर , दर्द से तादात्म्य स्थापित कर हम दर्द को कम तो कर ही सकते है ! एक स्त्री अपने पुरे जीवनकाल में किसी न किसी रुढ़िवादी रीतियों अथवा सामाजिक व्यवस्था के खूंटे से बंधी रहने वाली गाय ही कही जाती है जिससे आज का समाज नित्य ही बाल्टी भर दूध , और घी की तमन्ना के रूप में बच्चे , वंशवृद्धी , परिवार का लालन-पालन की तम्मना ही रखता है और यदि यह गाय समझी जाने वाली स्त्री विरोध में हिनहिना दे , सिंग उचका दे , पैर पटक दे , लात जड़ दे तो त्राहि त्राहि मच जाती है , सामाजिक व्यवस्था की दुहाई दी जाने लगती है , पूर्वकालिक पोथियाँ निकाल कर स्त्री वर्णमाला का ककहरा सिखाया जाने लगता है ! लेखिका ने अपने हर वक्तव्य और अनुभव में इस बात का पुरजोर विरोध दर्ज करवाया है कि समय के बदलाव के अनुरूप अब कई वर्जनाये , व्यवस्थाये ध्वस्त की जाना चाहिए ! कई कई जगह इसी आशय पर मूल विषय मै से माँ तक नही होकर मै से मै तक स्त्रिगाथा जान पड़ा , अच्छी बात है कि स्त्रिओं को मुखर और आडम्बर का विरोधी होना भी चाहिए इसीलिए कही कही विषय पुरुष बनाम महिला सा हो गया है ! लेखिका का महिलावादी उदार रवैया पुरुषों को प्रश्नवाचक निगाह से भी देखता है और यह भूल जाता है कि उसके ममत्व और किलकारी में पुरुषों का भी उतना ही योगदान है जितना कि उसका स्वयम का ! दोनों ही अर्धनारीश्वर है एक दूजे के बिना अधूरे और बिना कोई अर्थ लिए ! किताब की भाषा सरल रखी गयी है लेकिन कही कही बड़े-बड़े संयुक्त वाक्य और अंग्रेजी के शब्द एक साथ पढ़ने पर मस्तिष्क तक सहज अर्थ नही पहुंचाते ! भाषा को धाराप्रवाह और गतिमान बनाये रखने की पूरी कोशिश की गयी है हालाँकि कही-कही इस बाबद निराशा भी हाथ लगी है मसलन – “पति उनके दुसरे बड़े शहर में रहते थे” के स्थान पर “उनके पति दुसरे बड़े शहर में रहते थे” कहा जाना सही अर्थ देता ! लेखिका द्वारा असहज और छुपाने वाले विषय पर भी खुल कर नि:संक होकर लिखा गया है चाहे वे खुद से सम्बंधित कोई बेहद निजी बात या कोई बिंदु ही क्यों न हो गोया कि जब विषय स्त्रिओं का होकर स्त्रिओं के लिए है तो इसमें दुराव-छिपाव की कोई गुंजाईश भी नही बचती इसलिए लेखिका ने विषय के साथ पूरा न्याय किया है ! लेखिका ने आज के समय और पुरातन व्यवस्था पर गहरा आत्मंथन कर परिवेश , सामाजिक ताने-बाने , और प्रथाओं की जड़ता पर आघात किया है ! जैसी सृष्टि वैसी दृष्टी की तर्ज पर लेखिका ने महिलाओं की व्यथा कथा , करुण गाथा और पितृसत्तात्मक प्रथा को भी आइना दिखने की कोशिश की है ! आज भी रुढिवादिता और बेटे की चाह की बेडिया समाज को जकड़े दिखती है जब लेखिका कहती है कि “ मेरे रिश्ते के लिए एक परिवार ने इसलिए मना कर दिया क्योकि मेरी माँ को कोई बेटा नही था , इसलिए मै भी शायद कभी एक बेटे को जन्म न दे पाऊ ! ” हालाँकि पश्चात लेखिका ने इस अनर्गल और बेसिरपैर की मान्यता को बेटा पैदा कर अच्छे से लात जमा दी ! कहना बेबाक होगा कि मै से माँ तक किताब को हर स्त्री को पढना चाहिए , इससे उन्हें कई नसीहते , जुझारूपन और आने वाली हर कठिन परिस्थिति का सहज भान हो सकेगा जिसका वे पहले से ही समाधान खोज कर रखेगी ! स्त्री विषय के बेहद संवेदनशील और अन्तस्थ मन के तारों से गहरे जुड़े गर्भावस्था विषय पर किताब रचने और और अपनी अनुभव यात्रा का हर पड़ाव सहजता के साथ साझा करने हेतु लेखिका ( अंकिता शकुन )को ह्रदय से शुभकामनाये ! - राजेश "राणा" के स्वर
| Best Sellers Rank | #65,153 in Books ( See Top 100 in Books ) #2,125 in New Age & Spirituality #4,614 in Personal Transformation |
| Customer Reviews | 4.2 out of 5 stars 276 Reviews |
P**A
Life experience
Bhut acchi book hai .Har pregnant lady ko padna chahiye . Bhut kuch sikhne ko milega bhut sare examples bhut sare myth dur hoge. Must read book in pregnancy time
R**I
समीक्षा
मै से माँ तक - समीक्षा --------------------------- मै से माँ तक महज एक किताब नही है , गर्भावस्था की मधुर और संवेदनशील जीवन यात्रा के हर पड़ाव का संस्मरण है , यह एक स्त्री दर्शन है , एक अनुभूति की अनंत यात्रा है जिसे 127 पृष्ठों में समेटा गया है ! मै से माँ तक हर गर्भवती स्त्री की अनुभूति है , जिसे लेखिका ने न केवल लिखा है वरन बखूबी जिया भी है ! मै से माँ तक हर एक महिला का मनोविज्ञान है जिसे बच्चे की चाह रखने वाली हर स्त्री और बच्चे की किलकारी सुनने की तमन्ना रखने वाले हर भावी पिता को न केवल पढ़ना चाहिए वरन हर द्रष्टान्त में दी गयी सलाह को अपनाना भी चाहिए ! एक स्त्री की गर्भगाथा को लेखिका ने बढे ही सहज ढंग से लिखा है ! किताब नई-नवेली दुल्हन , कामकाजी महिलाएं , बच्चे की आस में बैठी महिलाओं के लिए एक अर्थपूर्ण सलाह-पुस्तिका है ! लेखिका द्वारा हरसंभव देसी नुस्खे , प्रेगनेंसी (गर्भावस्था) से जुडी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी तकनिकी और चिकित्सकीय सलाह को साझा किया है और पूर्ण विवरण भी दिया है ! कहते है हम किसी के दर्द को सह कर महसूस तो नही कर सकते लेकिन उस दर्द के साथ अपनापन दिखाकर , दर्द से तादात्म्य स्थापित कर हम दर्द को कम तो कर ही सकते है ! एक स्त्री अपने पुरे जीवनकाल में किसी न किसी रुढ़िवादी रीतियों अथवा सामाजिक व्यवस्था के खूंटे से बंधी रहने वाली गाय ही कही जाती है जिससे आज का समाज नित्य ही बाल्टी भर दूध , और घी की तमन्ना के रूप में बच्चे , वंशवृद्धी , परिवार का लालन-पालन की तम्मना ही रखता है और यदि यह गाय समझी जाने वाली स्त्री विरोध में हिनहिना दे , सिंग उचका दे , पैर पटक दे , लात जड़ दे तो त्राहि त्राहि मच जाती है , सामाजिक व्यवस्था की दुहाई दी जाने लगती है , पूर्वकालिक पोथियाँ निकाल कर स्त्री वर्णमाला का ककहरा सिखाया जाने लगता है ! लेखिका ने अपने हर वक्तव्य और अनुभव में इस बात का पुरजोर विरोध दर्ज करवाया है कि समय के बदलाव के अनुरूप अब कई वर्जनाये , व्यवस्थाये ध्वस्त की जाना चाहिए ! कई कई जगह इसी आशय पर मूल विषय मै से माँ तक नही होकर मै से मै तक स्त्रिगाथा जान पड़ा , अच्छी बात है कि स्त्रिओं को मुखर और आडम्बर का विरोधी होना भी चाहिए इसीलिए कही कही विषय पुरुष बनाम महिला सा हो गया है ! लेखिका का महिलावादी उदार रवैया पुरुषों को प्रश्नवाचक निगाह से भी देखता है और यह भूल जाता है कि उसके ममत्व और किलकारी में पुरुषों का भी उतना ही योगदान है जितना कि उसका स्वयम का ! दोनों ही अर्धनारीश्वर है एक दूजे के बिना अधूरे और बिना कोई अर्थ लिए ! किताब की भाषा सरल रखी गयी है लेकिन कही कही बड़े-बड़े संयुक्त वाक्य और अंग्रेजी के शब्द एक साथ पढ़ने पर मस्तिष्क तक सहज अर्थ नही पहुंचाते ! भाषा को धाराप्रवाह और गतिमान बनाये रखने की पूरी कोशिश की गयी है हालाँकि कही-कही इस बाबद निराशा भी हाथ लगी है मसलन – “पति उनके दुसरे बड़े शहर में रहते थे” के स्थान पर “उनके पति दुसरे बड़े शहर में रहते थे” कहा जाना सही अर्थ देता ! लेखिका द्वारा असहज और छुपाने वाले विषय पर भी खुल कर नि:संक होकर लिखा गया है चाहे वे खुद से सम्बंधित कोई बेहद निजी बात या कोई बिंदु ही क्यों न हो गोया कि जब विषय स्त्रिओं का होकर स्त्रिओं के लिए है तो इसमें दुराव-छिपाव की कोई गुंजाईश भी नही बचती इसलिए लेखिका ने विषय के साथ पूरा न्याय किया है ! लेखिका ने आज के समय और पुरातन व्यवस्था पर गहरा आत्मंथन कर परिवेश , सामाजिक ताने-बाने , और प्रथाओं की जड़ता पर आघात किया है ! जैसी सृष्टि वैसी दृष्टी की तर्ज पर लेखिका ने महिलाओं की व्यथा कथा , करुण गाथा और पितृसत्तात्मक प्रथा को भी आइना दिखने की कोशिश की है ! आज भी रुढिवादिता और बेटे की चाह की बेडिया समाज को जकड़े दिखती है जब लेखिका कहती है कि “ मेरे रिश्ते के लिए एक परिवार ने इसलिए मना कर दिया क्योकि मेरी माँ को कोई बेटा नही था , इसलिए मै भी शायद कभी एक बेटे को जन्म न दे पाऊ ! ” हालाँकि पश्चात लेखिका ने इस अनर्गल और बेसिरपैर की मान्यता को बेटा पैदा कर अच्छे से लात जमा दी ! कहना बेबाक होगा कि मै से माँ तक किताब को हर स्त्री को पढना चाहिए , इससे उन्हें कई नसीहते , जुझारूपन और आने वाली हर कठिन परिस्थिति का सहज भान हो सकेगा जिसका वे पहले से ही समाधान खोज कर रखेगी ! स्त्री विषय के बेहद संवेदनशील और अन्तस्थ मन के तारों से गहरे जुड़े गर्भावस्था विषय पर किताब रचने और और अपनी अनुभव यात्रा का हर पड़ाव सहजता के साथ साझा करने हेतु लेखिका ( अंकिता शकुन )को ह्रदय से शुभकामनाये ! - राजेश "राणा" के स्वर
V**U
Realistic Book
Realistic As a Reader I found many new things and prospective Like emotion , mood changes , importances of education , human behaviour and writer own experience It's interesting book Finished in two days
H**R
Very good
Very good
T**U
औसत
लेखिका, बेटे की चाह से ग्रसित और गर्भावस्था को अति कठिन की अतिशयोक्ति पूर्ण लेखन।
D**V
उम्दा
मां बनने के दौर में जरूर पढ़ी जानी चाहिए अंकिता जी को बधाई उनकी रचनात्मकता उनकी इस किताब में भी दिखती है
A**I
घटिया बुक है
घटिया और वाहियात बुक है महिलाऐं इसे पढ़ के नकारात्मक बाते सोचती हैं , मिसकैरेज और मैटरनल डेथ के बारे में लिखा है इसमें।
U**A
Nice this product
Nice
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2 weeks ago
1 week ago